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Showing posts from November, 2019
उसे हमेशा हस्ते और हँसाते हुए देखा था पर उस दिन ज्यादा ही खुश थी पहले प्यार का सुरूर जो छाया था  थोड़ी सी मिठास घुल गई थी उसके जज़्बातों में पिघल ने लगी थी वो उन अल्फाज़ो में जिसे दूर भागा करती थी बोहोत ही बकलोल थी वैसे पर आज गुमसुम थी क्योंकि शायद वो पगली जिस्म की प्यास को प्यार समज बैठी थी समज नही पा रही थी कि किसे ओर कैसे बताऊ  अपना ये मोहोब्बत-ए-जिस्म का कारवां ज़माना,लोग,दोस्त,मा पापा क्या सोचेंगे केसी नज़र से देखेंगे सोच विचारो का तूफान टकरा ने लगे उसके दिल के जज़्बात से इज़हार न कर सकी अपना हाल-ए-दिल  और चली गई हाथ मे सिर्फ एक कागज छोड़ कर। - निराली