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उसे हमेशा हस्ते और हँसाते हुए देखा था
पर उस दिन ज्यादा ही खुश थी
पहले प्यार का सुरूर जो छाया था 
थोड़ी सी मिठास घुल गई थी उसके जज़्बातों में
पिघल ने लगी थी वो उन अल्फाज़ो में जिसे दूर भागा करती थी
बोहोत ही बकलोल थी वैसे पर आज गुमसुम थी
क्योंकि शायद वो पगली जिस्म की प्यास को प्यार समज बैठी थी
समज नही पा रही थी कि किसे ओर कैसे बताऊ 
अपना ये मोहोब्बत-ए-जिस्म का कारवां
ज़माना,लोग,दोस्त,मा पापा क्या सोचेंगे केसी नज़र से देखेंगे
सोच विचारो का तूफान टकरा ने लगे उसके दिल के जज़्बात से
इज़हार न कर सकी अपना हाल-ए-दिल 
और चली गई हाथ मे सिर्फ एक कागज छोड़ कर।

- निराली

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